अरबईन मार्च : दुनिया को आईना दिखाता मुहब्बत का सफर

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क़मर अब्बास सिरसिवी
आज जब दुनिया में मज़हब के नाम पर सबसे ज्यादा प्रोडक्ट्स बड़ी आसानी से बेचे जा रहे है, मज़हब के नाम की बहुत सी दुकानें अलग अलग तरीके से मज़हब को दुनियावी फायदों के लिए बेचने में लगी हुई हैं ऐसे बाज़ारपरस्त माहौल में इराक़ के एक शहर नजफ से दूसरे शहर कर्बला तक तक़रीबन 85 किलोमीटर की दूरी को तय करता अरबईन मार्च नाम का एक सफर मजहब की असल जड़ यानी मुहब्बत, रहम और ख़िदमत की बेमिसाल ताक़त का ऐलान करते हुए मजहब के नाम पर चलने वाली तमाम दुकानों को हक़ीक़त का आईना दिखाता है इस सफर में शरीक हुए लोगों की ज़बान और कलम से ये बात सामने आती है कि इस दूरी को तय करने के दौरान मुसाफिरों को अपनी जायज़ ज़रूरतों की तकरीबन तमाम चीजें बिना किसी दाम के मुहैय्या कराई जाती हैं जिसके बदले वहां के बाशिंदे किसी रक़म या दुनियावी बदले की तमन्ना नहीं रखते हैं

इन कामों को करने में वहाँ के आम किसानों से लेकर डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, टीचर्स, सियासी और मज़हबी लीडर्स तक शामिल होते हैं यहां मज़हबी जज्बात के तहत जाने वाले इंसानों की जेब पर डाका डालने की कोई कोशिश नहीं की जाती है नजफ से कर्बला का यह सफर ठहरने, खाने, इलाज जैसी तमाम इंसानी ज़रूरतों को मुफ्त मुहैय्या करा कर दुनिया को यह पैग़ाम देता है कि मज़हब, मुहब्बत में ख़िदमत करने का नाम है लूटने का नहीं | ठहरने के लिए आरामदायक टेंट और मकान, मोबाइल वॉशरूम्स, खाने के लिए सैकड़ों किस्म की डिशेज़ और फल, मरीजों के लिए डॉक्टर्स और दवाइयां, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट्स, पैरों की मालिश और जूतों की मरम्मत करते लोग, यहां तक की जगह जगह टिश्यू पेपर बांटते हुए बच्चे यह साबित करते हैं कि यहाँ मजहब खरीद और बिक्री की चीज नहीं है बल्कि इसका रिश्ता सिर्फ और सिर्फ मुहब्बत और ख़िदमत से है जिसका बदला खुदा के अलावा कोई इंसान नहीं दे सकता है | जब इस सफर में जुड़ी हुई मुहब्बत की दास्तान समझने की कोशिश की जाती है

तो फिर ये तलाशना पड़ता है कि ये सफर किस मकसद से और कौन लोग कर रहे हैं जिनके लिए सालों की जंग, आईएसआईएस और अमेरिकी दहशतगर्दी से बर्बाद मुल्क के बाशिंदे पूरे साल की मेहनत की कमाई को अंजान और ग़ैर मुल्की मुसाफिरों पर खर्च करने के लिए बाख़ुशी आमादा रहते हैं तो पता चलता है कि 10 मुहर्रम सन 61 हिजरी को कर्बला में रसूले इस्लाम के नवासे हुसैन और उनके साथियों को उनकी इंसानियत परस्त सोच और ज़ुल्म की खुली मुख़ालफ़त के सबब उस वक्त के ज़ालिम हुक्मरान यज़ीद ने कर्बला के रेगिस्तान में क़त्ल करा दिया था | अरबईन, अरबी का शब्द है जिसके मानी है 40 वां दिन

अरब मे किसी शख्स की मौत के 40 वे दिन को इस नाम से याद किया जाता है इसलिए 10 मुहर्रम को शहीद हुए हुसैन और उनके साथियों के शहादत के 40 वे दिन को अरबईन कहते हैं और उनसे और उनके पैग़ाम से मुहब्बत और अकीदत रखने वाले लोग, इस दिन कर्बला पहुंचने के लिए हफ्तों पहले अपने घरों से कर्बला की तरफ सफर शुरू करते हैं जिसमें सबसे बड़ा कारवां, नजफ से कर्बला तक जाता है इसे ही अरबईन मार्च के नाम से जाना जाता है | हुसैन की बहन और बेटे ने अपनी क़ैद और क़ैद से रिहाई के बाद इस्लाम की अस्ल तालिमात और उनकी हिफाजत के लिए शहीद हुए हुसैन के, इंसानियत से मुहब्बत और ज़ुल्म की मुख़ालफ़त के पैग़ाम को दुनिया के सामने इस अंदाज में पेश किया कि हर सुनने और जानने वाला इंसान बिना किसी मज़हब या अक़ीदे के फर्क़ के हुसैन को मुहब्बत और अक़ीदत की नजरिए से देखता, समझता और मानता है इसी वजह से अरबईन मार्च में न सिर्फ इस्लाम बल्कि दीगर मजहब के लोग भी खुलूस और मुहब्बत के साथ शामिल होते हैं और ये हर साल होने वाली दुनिया की सबसे बड़ी इंसानी गैदरिंग है जहाँ इंसानी ख़िदमत को सबसे बड़ा मज़हब माना जाता है

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