लखनऊ आसिफ़ी मस्जिद में शहीद क़ासिम सुलेमानी और अबू मेंहदी अल मुहन्दिस की याद में मजलिस को सम्बोधित करते मौलाना सै० रज़ा हैदर ज़ैदी।

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लखनऊ आसिफ़ी मस्जिद में शहीद क़ासिम सुलेमानी और अबू मेंहदी अल मुहन्दिस की याद में मजलिस को सम्बोधित करते मौलाना सै० रज़ा हैदर ज़ैदी।

आसिफी मस्जिद में शहीद क़ासिम सुलेमानी और अबू मेंहदी अल मुहन्दिस की याद में मजलिसे अज़ा का आयोजन

लखनऊ : शहीद क़ासिम सुलेमानी और शहीद अबू मेंहदी अल मुहन्दिस के इसाले सवाब और उन्हें ख़िराजे अक़ीदत पेश करने के लिए मजलिसे उलमा-ए-हिंद की जानिब से आज नामज़े जुमा के बाद असिफी मस्जिद में मजलिसे तरहीम का आयोजन हुआ। मजलिस को नायब इमामे जुमा मौलाना सै० रज़ा हैदर ज़ैदी ने ख़िताब किया। ज्ञात रहे कि हर साल शहीद क़ासिम सुलेमानी और शहीद अबू मेंहदी अल मुहन्दिस की मुनासिबत से मजलिसे अज़ा का आयोजन होता हैं, जिन्हें दो जनवरी को बग़दाद एयरपोर्ट के बाहर अमरीका ने बुज़दिलाना हमले में शहीद कर दिया था।

आसिफी मस्जिद में मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना सै० रज़ा हैदर ज़ैदी ने कहा कि कुछ शहादतें राष्ट्रीय और भौगोलिक स्तर पर याद की जाती हैं और कुछ शहादतों को विश्व स्तर पर याद किया जाता हैं। मिसाल के तौर पर हमारे देश की आज़ादी में जिन मुजाहेदीन ने क़ुर्बानिया पेश की, हम हर साल और हर अवसर पर उनकी क़ुर्बानियों को याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं, जैसे शहीद मौलवी मुहम्मद बाक़िर जिन्होंने 1857 की जंगे आज़ादी में अहम किरदार अदा किया। इसी जुर्म में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बेरहमी से शहीद कर दिया था। इसी तरह हमारे वो फौजी जिन्होंने हमारे देश की सीमाओं और हमारी सुरक्षा के लिए अपनी जानो को क़ुर्बान किया। यक़ीनन उनकी क़ुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन क्या किसी भी देश के शहीदों की याद दूसरे देश में मनाई जाती है? हरगिज़ नहीं! क्योकि हर क़ुरबानी अपने हदफ़ के लिहाज़ से अहमियत की हामिल होती हैं। जो क़ुर्बानिया मानवता, शराफ़त और वैश्विक अत्याचार के ख़िलाफ़ होती हैं उसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। मौलाना ने कहा कि आज शहीद क़ासिम सुलेमानी की शहादत की याद हर देश में मनाई जाती है क्योंकि उनकी शहादत किसी एक देश और क़ौम के लिए नहीं थी। उन्होंने मानवता के लिए अपनी जान क़ुर्बान की इसलिए आज भी पूरी दुनिया में लोग उन्हें याद करते हैं। मौलाना ने कहा कि मैदाने अमल में हक़ की रक्षा और बचाव के लिए अपना ख़ून देना हर किसी के बस की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर शहीद क़ासिम सुलेमानी और उनके साथी नहीं होते तो आई.एस.आई.एस जैसा आतंकी संगठन इराक़ और सीरिया तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया को नर्क बना देता। मौलाना ने मुख़्तसर पैराय में शहीद क़ासिम सुलेमानी और शहीद अबू मेंहदी अल मुहन्दिस के कारनामों का ज़िक्र किया। इसके बाद उनकी शहादत के वाक़िये और उसके असरात का तजज़िया भी पेश किया। मजलिस के आख़िर में मौलाना ने इमाम हुसैन (अ.स) के भाई हज़रत अब्बास (अ.स) की शहादत के वाक़िये को बयान किया जिस पर बेहद गिरया हुआ।

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