क्या विदेश मंत्री एस जयशंकर की बात मानेंगे तालिबान नेता मौलवी  हिब्तुल्लाह अखुंदजादा

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अफगानिस्तान : अप्रैल से ही अफगानिस्तान में तालिबान ने तेजी से पांव पसारने शुरू कर दिए गए थे। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े सूत्रों का अनुमान है कि तालिबान अफगास्तिान पर करीब 80 हजार लड़ाकों की मदद से सत्ता पर काबिज होना चाहता है। पिछले चार महीनों के दौरान जंग में 1100 से अधिक अफगान सेना के जवान और करीब चार हजार लोग मारे जा चुके हैं। ऐसे में क्या तालिबान के प्रमुख मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंदजादा भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की बात मान लेंगे।

विदेश मंत्री एस जयशंकर इस समय ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने गए हैं। इस बैठक में रूस, चीन समेत सभी देशों के विदेश मंत्रियों की चर्चा का मुख्य केंद्र अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना है। विदेश मंत्री ने इस बैठक में तालिबान को हिंसा के रास्ते से सत्ता पाने की कोशिशों के लिए चेताया है। विदेश मंत्री ने कहा कि इस रास्ते से अच्छे परिणाम नहीं हासिल होने वाले हैं। उन्होंने तालिबान को नसीहत देते हुए कहा कि अफगान नेताओं को सभी जातियों, धर्मों, समूहों के लोगों को साथ लेकर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के लोग एक स्वतंत्र, तटस्थ, शांतिपूर्ण, एकजुट और लोकतांत्रिक अफगानिस्तान चाहते हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए अफगानिस्तान के संघर्ष को राजनीतिक बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। सभी धर्मों, कबीलों की भागेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए और यह तय करना होगा कि इस प्रक्रिया में पड़ोसी देशों को आतंकवाद, उग्रवाद, अलगाववाद का खतरा न हो।

भारत सरकार ने पिछले 20 साल में तालिबान और इसके नेताओं से कभी कोई संपर्क नहीं साधा। यहां तक कि 2008-09 में पाकिस्तान की तालिबान के नेताओं से अमेरिकी प्रतिनिधियों की बातचीत जैसे प्रयास का विरोध किया था। भारत ने अच्छे और बुरे तालिबान के तर्क को भी खारिज कर दिया था। भारत सरकार ने अफगानिस्तान में अपने हित और अफगानिस्तान के निर्माण का रास्ता वहां की सरकार के माध्यम से तय किया। भारत की इस कोशिश के सामानांतर पाकिस्तान तालिबान की सरकार को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में शामिल था। पाकिस्तान ने ही सबसे अंत में तालिबान सरकार के साथ अपने राजनयिक रिश्ते समाप्त किए। विदेश, रक्षा, खुफिया जानकारों की मानें तो तालिबान के तमाम सैन्य कमांडरों और कई शीर्ष नेताओं को पाकिस्तान से सहायता मिलती है। चीन ने भी अफगानिस्तान में अपनी योजना को साकार करने के लिए पाकिस्तान का सहारा लिया है। बताते हैं कि चीन के ही प्रयास से रूस ने पाकिस्तान के साथ संबंध ठीक किए हैं और चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान अपना हित साधने का रोडमैप बना रहे हैं। तुर्की ने अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के प्रयासों को तेज कर दिया है। उसने एक तरफ अमेरिका तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को साधने की भी कोशिशें तेज की हैं। इस रोडमैप में भारत के पास सबसे विश्वस्त सामरिक साझीदार सहयोगी देश केवल रूस है। बताते हैं कि यह चिंता केवल भारत की नहीं है। उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान की भी है। हालांकि ये अफगानिस्तान के पड़ोसी देश हैं।

सामरिक और सुरक्षा के जानकार कभी अफगानिस्तान में सीरिया जैसे हालात पैदा होने की आशंका से पीडि़त हो रहे हैं तो कभी वहां बड़े पैमाने पर गृहयुद्ध भड़कता दिखाई दे रहा है। प्रो. मुनि तो कहते हैं कि देखना है, अमेरिका क्या कदम उठाता है। अफगानिस्तान मामलों से जुड़े और विदेश मंत्रालय के अवकाश प्राप्त राजनयिक ने ऑफ द रिकार्ड कहा कि अफगानिस्तान टाइम बम की तरह है। वह कहते हैं कि चुनौती बड़ी है और चुनौती के लिहाज से समय काफी है। वह कहते हैं कि समस्या कुछ खास कारणों से बड़ी है। पहली तो यह कि पिछले 15 साल में तालिबान ने अपनी ताकत खूब बढ़ा ली है। पश्तो समूह के लड़ाके तालिबान में यकीन रख रहे हैं। दूसरे हजारा, बलोच, उज्बेक और नॉदर्न अलायंस के सैन्य कमांडरों में एकता नहीं है। इस्माइल खान जैसे लोगों के क्षेत्र में तालिबान ने कब्जा कर लिया है।

यह सवाल पेचीदा है। इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की टीम इसी का जवाब तलाशने में लगी है। इस टीम को पता है कि अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता पर काबिज हुआ तो हालात 90 के दशक से कई गुना अधिक खराब हो सकते हैं। अफगानिस्तान और तालिबान से संबंधों तथा हितों के मामले में भारत को ऐसी स्थिति में दूसरे देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। सऊदी अरब, यूएई, रूस, ईरान अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

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