पार्टी में दंगल और नेताओं के बीच बहस

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दिल्ली : सीपीआई नेता कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने से पहले ही पार्टी में दंगल शुरू हो गया है। उनके पार्टी में शामिल होने को लेकर पार्टी नेताओं की राय अलग अलग बंट गई है। कोई इसे पार्टी के लिए फायदेमंद बता रहा है तो कोई पूछ रहा है, इससे क्या फायदा होगा?  कांग्रेस नेता और पंजाब से सासंद मनीष तिवारी ने किसी का नाम लिए बगैर तंज में सीपीआई नेता कन्हैया कुमार और गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी के पार्टी में शामिल होने को लेकर सवाल उठाए हैं। कन्हैया कुमार गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी के साथ कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मौजदूगी में कांग्रेस का चेहरा बनने जा रहे हैं।

मनीष तिवारी ने 1973 में आई पुस्तक कम्युनिस्ट इन कांग्रेस कुमारमंगलम थीसिस का हवाला देते हुए कहा है कि इसे फिर से पढ़ना फायदेमंद हो सकता है। जितनी अधिक चीजें बदलती हैं, उतनी ही वे शायद वैसी ही रहती हैं। इस ट्वीट के जरिए तिवारी ने कांग्रेस आलाकमान के फैसले पर सवाल उठाया है। मनीष तिवारी, जी 23 (पार्टी नेतृत्व से नाराज और असंतुष्ट नेताओं का समूह) के उन नेताओं में से एक हैं जो पार्टी नेतृत्व के मुखर विरोधी माने जाते हैं।

हालांकि कन्हैया कुमार की कांग्रेस में दिलचस्पी जगाने और उनकी राहुल गांधी से मुलाकात के पीछे बिहार से कांग्रेस के विधायक शकील अहमद खान की बड़ी भूमिका बताई जाती है। कुमार के पार्टी में आने के सवाल पर कांग्रेस विधायक ने कहा है कि वामपंथी विचारधारा से जुड़े कई नेता अभी पार्टी में सक्रिय हैं, मैं खुद वामपंथी हूं, प्रियंका गांधी की टीम में जुड़े संदीप सिंह उसी पृष्ठभूमि के हैं। सवाल यह है कि निश्चित तौर पर कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा रखने वाले उस विचारधारा को भी मानने को तैयार हैं तो विरोध कैसा? शकील अहद खान कहते हैं कन्हैया कुमार आंदोलन से निकले हुए नेता हैं और कांग्रेस को अभी हर दिन आंदोलन की जरूरत है, ऐसे में वे निश्चित तौर पर सिर्फ बिहार कांग्रेस में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कांग्रेसियो के बीच ऊर्जा का प्रवाह करेंगे।

कांग्रेस को बहुत करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई एक दूसरे पक्ष पर रोशनी डालते हैं। उनका कहना है कांग्रेस और वाम विचारधारा को लेकर कभी कोई कलह नहीं रहा है। वाम सोच का कांग्रेस से कोई नाना का रिश्ता नहीं है। पिछली सरकारों का इतिहास देखें वाम दलों ने अक्सर कांग्रेस का साथ ही दिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना-कांग्रेस सहयोगी हैं, इसलिए कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने को इसे पार्टी की राजनीतिक कौशलता का पैमाना माना जाना चाहिए

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