कानपुर केस 48 घंटे सुनी 70 फोन की बातचीत तब पकड़े गए अपहरणकर्ता अभी तक नहीं मिला शव

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कानपुर : संजीत के अपहरण-हत्याकांड में जो मेहनत पुलिस ने लगभग एक माह बाद की, वही अगर अपहरण के तुरंत बाद कर लेती तो सम्भव है उसकी जान बच जाती। घटना के खुलासे के तीन दिन पहले पुलिस ने 70 मोबाइल नंबर की बातचीत सुननी (लिसनिंग) शुरू की। 48 घंटे तक लगातार लिसनिंग पर लिए गए इन नंबरों से पता चला कि एक आरोपित ने अपने रिश्तेदार से बात की है। मामला वहीं से खुलना शुरू हो गया और दिन भर में सारे आरोपित पकड़ लिए गए।

22 जून को संजीत की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई तो

तत्कालीन बर्रा इंस्पेक्टर रणजीत राय ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। पुलिस अधिकारी हों या फिर इंस्पेक्टर, सभी को यही लग रहा था कि 26 साल के लड़के का अपहरण कौन कर सकता है। मामला तब गम्भीर हुआ जब 29 जून को 30 लाख रुपए फिरौती के लिए पहली कॉल परिजनों के पास आई। इस दौरान पुलिस सिर्फ नामजद आरोपितों और परिवार के मोबाइल नंबर की ही जांच कर रही थी। फिरौती की कॉल आने के बाद पुलिस ने जाल बुना। तत्कालीन एसपी साउथ अपर्णा गुप्ता के बयान के अनुसार गुजैनी पुल से बैग फेंका गया। जब तक पुलिस वहां पहुंचती अपहरणकर्ता बैग लेकर भाग चुके थे। पुलिस का यह ऑपरेशन फेल हुआ तो मामला और बिगड़ गया। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने तीस लाख रुपए भी दिलवा दिए और बेटा भी बरामद नहीं हुआ।

फेल हुए तब एसएसपी को बताया

फिरौती देने का ऑपरेशन फेल हुआ तब पूर्व एसएसपी दिनेश कुमार पी के संज्ञान में पूरी घटना विस्तार से लाई गई। एसएसपी ने अपनी स्वाट और सर्विलांस टीम लगाई। थाने की पुलिस को इस केस से दूर रखा गया। केस पर पहले कुछ काम ही नहीं किया गया था, जिससे एसएसपी की टीम को भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। सर्विलांस सेल ने डाटा फिलट्रेशन के जरिए संदिग्ध नम्बरों की सूची जुटाई। उससे कुछ नम्बरों को लिसनिंग पर लिया गया।

तीन दिन में हो गया खुलासा

21 जुलाई तक संदिग्ध नम्बरों के अलावा उनसे जुड़े आगे के तीन और नंबरों (बी सी और डी पार्टी तक के नम्बर) लिसनिंग पर ले लिए गए। पुलिस 70 नम्बरों पर होने वाली बातचीत एक साथ सुन रही थी। 48 घंटे तक लगातार ऐसा करने के बाद 23 जुलाई की सुबह पहली सफलता मिली। घटना का आरोपित नीलू सिंह अपने रिश्तेदार से बात कर रहा था। उसने इस घटना की थोड़ी बहुत जानकारी रिश्तेदार को दी थी। यहां से सुराग मिला तो पुलिस ने रिशतेदार के नम्बर से लोकेशन ट्रेस की और सबसे पहले नीलू को दबोचा। इसके बाद पुलिस के सामने पूरी घटना स्पष्ट थी। एक-एक कर सभी आरोपित दबोच लिए गए और पुलिस ने 24 जुलाई को खुलासा कर दिया, हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

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